सब्र और शुक्र
सब्र और शुक्र
आज के सुख के लिए कभी रखा था सबर
माँगा था जो नहीं मिला उसका भी शुकर
कभी चाहा बगिया में आये हल्की सी धूप
तुमने कर दी पर बिन मौसम बारिश खूब
अब खिलते देखो बाग़ में सैकड़ों गुल गुलाब
आज के सुख के लिए कभी रखा था सबर
माँगा था जो नहीं मिला उसका भी शुकर
मांगते थे तुमसे जिंदगी में प्यार हो जाए पूरा
नहीं देखा धोखेबाज़ की आँखों का रंग भूरा
अब रातों को सुकूं है दिन में तरक्की के ख्वाब
आज के सुख के लिए कभी रखा था सबर
माँगा था जो नहीं मिला उसका भी शुकर
बीमारी बुढ़ापे में तड़पते थे हो गए थे लाचार
मांगते बस मौत नहीं रहा था परिवार से प्यार
पोती की है शादी अब डाल रही बड़ी अचार
आज के सुख के लिए कभी रखा था सबर
माँगा था जो नहीं मिला उसका भी शुकर
मन माँगा हासिल हो जाता प्रभु उस बार
आज जीवन में होते दुःख दर्द क्लेश अपार
बिन मांगे मोती क्या मिल गए मुझको हीर
भरोसा कर के देखा हुई तेरी मेहर हर बार।
