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Prashant. Suman

Drama Fantasy


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Prashant. Suman

Drama Fantasy


सबब उदासी का

सबब उदासी का

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आँखें बयाँ न कर दें,

सबब उदासी का,

फिर क्या मज़ा रह जाएगा,

ज़िंदगी का ।


वो एक बेहद ही,

खुशमिजाज़ जलपरी है,

मैं एक गहरा दरिया हूँ,

ख़ामोशी का ।


भटक कर बैठ जाना,

कोई ताज्जुब नहीं,

कोई नहीं ढूँढ सका है,

पता आसूदगी का ।


हादसों को मुजरे में,

बदलती है कैमरे से,

दुनिया एक मेला है,

ऐसी ही दरिंदगी का ।


सारे दुःख उग लिए,

फसल भी काट ली,

बता ख़ुदा, क्या करना है,

अब ज़मीं का ।


वो जो मेरे ऐबों से,

समझौता कर लेगा,

ख़्वाब देखता रहता हूँ,

उस अजनबी का ।


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