STORYMIRROR

Deepa Jha

Abstract

4  

Deepa Jha

Abstract

सागर की गहराई

सागर की गहराई

1 min
219

वो किसी दर्द में था,

तुम उसकी ज़िद समझ बैठे ,

शब्द ओझल हो जाते जब उसके होठों से ,

तो तुम उसे उद्दंड कह जाते,

समझा नहीं पाता व्यथा जब मन की ,

तो बेपरवाह कह उसे टाल जाते ,

जब भी सागर से मोती की खोज में समय लगता 

अपनी घडी की सुईओं की दौड़ में ,

तुम उसे कितना आलसी - नासमझ मान लेते।

क्या लगता नहीं तुम्हें ,

तुम सागर की गहराई का अंदाज़ा ,

बिना सागर में उतरे ही लगा लेना हो चाहते?



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract