सागर की गहराई
सागर की गहराई
वो किसी दर्द में था,
तुम उसकी ज़िद समझ बैठे ,
शब्द ओझल हो जाते जब उसके होठों से ,
तो तुम उसे उद्दंड कह जाते,
समझा नहीं पाता व्यथा जब मन की ,
तो बेपरवाह कह उसे टाल जाते ,
जब भी सागर से मोती की खोज में समय लगता
अपनी घडी की सुईओं की दौड़ में ,
तुम उसे कितना आलसी - नासमझ मान लेते।
क्या लगता नहीं तुम्हें ,
तुम सागर की गहराई का अंदाज़ा ,
बिना सागर में उतरे ही लगा लेना हो चाहते?
