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bhavna vidhani

Tragedy

4  

bhavna vidhani

Tragedy

रूह की पुकार

रूह की पुकार

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जिस्म के पिंजरे में कैद रूह,

कर रही है बार बार चीत्कार 

मुक्त कर दो अब बस मुझे,

सहा नहीं जाता अब अत्याचार।


जिस्म मेरा मर्जी किसी और की,

क्यों नहीं मेरा मुझ पर अधिकार।

कैदी सी बीत रही मेरी जिंदगी,

रूह मुक्त होने को है बेकरार।


मेरे सपनों का कोई मोल नहीं,

मैं भी हूं खुशियों की हकदार।

ऊपर से खुश रहती हूं हर पल,

दिल में मेरे है गम हजार।


अब और मौन रहा नहीं जाता,

दिल हर पल करता है चीख पुकार।

चार दिन की जिंदगी मिली है,

खुशी से जी लेने दो बस इस बार।



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