रिश्ते और वजह
रिश्ते और वजह
दौर नहीं रहा वो अब
कि ख़ुद को छोड़ आएं किसी की ऑंखों में
उसका सपना बनकर
रख आएं ज़िंदगी किसी के हाथों में
उसकी तक़दीर बनकर
और फिर सोचते रहें कि
हम ख़ुद को कभी मिलें ही नहीं
जब भी मिलें तो
सारा का सारा उसी को मिलें..
दौर नहीं रहा वो अब
कि अपनी बातों में बस उसकी ही बातें रहें
अपनी हंसी में वो ही खिलखिलाती मिले
अपनी निगाहों में उसका ही पता दिखता हो
अपनी रूह में उसकी ही महक उठती हो
और ख़ुद को इस तरह भूल जाएं
कि जब भी कोई पुकारे नाम उसका
बस तभी देखें हम मुड़कर किसी को..
दौर नहीं रहा वो अब
जब ख़ुद को ख़ुद से ज़्यादा उसमें महफ़ूज़ समझें
और अपने वजूद को उसके पहलू में छोड़ आएं..
पल पल रंग बदलते इस ज़माने में
और दिल की जगह
दिमाग़ से इश्क़ करने के चलन में
ख़ुद में डूबे रहना ही बेहतर है
और कुछ नहीं तो
ख़ुद से इश्क़ करने में
किसी से कोई शिकायत तो नहीं रहेगी
किसी से धोखा तो नहीं मिलेगा
किसी के चले जाने का कोई मलाल तो नहीं रहेगा
और अपनी आख़री साॅंस तक
ख़ुद के साथ रहने की
ख़ुद से रिश्ता निभाने की
इक मुक्कमल वजह तो बनी रहेगी !

