पुरुषार्थ
पुरुषार्थ
यहॉं संसार में बिना पुरुषार्थ के
कुछ प्राप्त नहीं होता,
बिना अभ्यास किये मूर्ख
किसी सिद्धि को प्राप्त नहीं कर सकता।
जैसे राजा की आज्ञा का
मंत्री लोग पालन करते हैं,
वैसे ही जो मन का निश्चय होता है
उसी को इन्द्रियों की वृत्ति संपादन करती हैं।
जो संसार के विषयों में
मन को नहीं लगाते,
विवेक प्राप्ति का यत्न करते रहते हैं
वे शान्ति का अनुभव करते हैं।
सुख दुःख की आशा का त्याग करके
तृष्णा की ज़ंजीर का त्याग करके,
महामना उदार- आत्मा व्यक्ति
क्षोभरहित समुद्र के समान स्थिर हो जाते हैं।
