STORYMIRROR

SUNIL JI GARG

Romance

4  

SUNIL JI GARG

Romance

पत्तों के पीछे से

पत्तों के पीछे से

1 min
306

यूं पत्तों के पीछे से झांककर क्यूँ देखा करती हैं आप

आप ही के लिए तो हम बागों के चक्कर लगाते हैं

आप समझती हैं कि हमको कुछ पता ही नहीं है

हम लखनऊ के नवाब यूं ही नहीं फाख्ता उड़ाते हैं


हर बार वही झील सी हरी नीली दिखती है आपकी आँख

आप पूरी कैसी होंगी, रोज़ ख्वाबों में देख देखकर थक गए

कैसी सचमुच में दिखती होंगी आप बला की बाला

बखान करते करते कलम और कलाम दोनों घिस गए


वैसे रिश्ते जल्दी ही कायम कर लेती है आपकी एक नज़र

ये लीफ ग्रीन कलर का साथ बड़ा सूट करता है आपको

ये पत्तियों की धारियां, लगती हैं जैसे आपकी अंगड़ाइयाँ

आपका बार बार अक्सर यूं निहारना लूट लेता है मुझको


आज ही पत्तों के पीछे से निकलकर मुखड़ा दिखा देना

मेरे घर वाले मुझ पर कुछ शक सा करने लगे हैं जाहिर

हाँ वैसे मैं कविता शेर वगैरह लिख लिया करता हूँ थोड़ा

पर मोहब्बत करने में बता दूँ, और भी ज़्यादा हूँ माहिर।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Romance