✍️🍁पतझड़ के झड़ते पत्ते 🍁✍️
✍️🍁पतझड़ के झड़ते पत्ते 🍁✍️
पतझड़ के झड़ते पत्ते ,
कुछ ही पेड़ में सजते पत्ते ।
हवा के झोंको से ,हल्की बारिश की बूंदों से ,
कभी लहराते हुए से, कभी बलखाते हुए से ।
मंद -मंद थोड़ा सा, बूंद- बूंद थोड़ा सा ,
कुछ हरी -पीली, कुछ काली- नीली ।
आते नीचे झर- झर -झर,
जाते ऊपर फर- फर- फर।
खुली -खुली सी मस्तानी सी सुबह है,
झुली -झुली सी मनमौजी सी शाम है।
धूप में जैसे सूरज दमकता,
सर्दी में वैसे चांद चमकता।
आओ रे आओ, ठंडी- ठंडी फुहारें ,
जाओ रे जाओ, गर्म- गर्म पवनें।
सजी महफिल है मेरी,
संजोए महबूब हैं मेरे।
शम्मा का रंग हो जैसे ,
शर्माया रुप हो वैसे ।
मैं झुम के, तुम घुम के,
पास आओ जरा रूक के।
मैं ठुमक -ठुमक के ,
तुम तुनक -तुनक के,
दूर जाओ जरा लुक के।
पतझड़ के झड़ते पत्ते,
कुछ ही पेड़ में सजते पत्ते।
Bhartinishi from kitabo ki duniya se ka ak suhawana aur sundar sa ahsaas....🤟🍁🍁🫶🍁🍁🥹

