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Nisha Bharti

Romance

4  

Nisha Bharti

Romance

✍️🍁पतझड़ के झड़ते पत्ते 🍁✍️

✍️🍁पतझड़ के झड़ते पत्ते 🍁✍️

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पतझड़ के झड़ते पत्ते ,

कुछ ही पेड़ में सजते पत्ते ।

हवा के झोंको से ,हल्की बारिश की बूंदों से ,

कभी लहराते हुए से, कभी बलखाते हुए से ।

मंद -मंद थोड़ा सा, बूंद- बूंद थोड़ा सा ,

कुछ हरी -पीली, कुछ काली- नीली ।

आते नीचे झर- झर -झर,

जाते ऊपर फर- फर- फर।

खुली -खुली सी मस्तानी सी सुबह है,

झुली -झुली सी मनमौजी सी शाम है।

धूप में जैसे सूरज दमकता,



सर्दी में वैसे चांद चमकता।

आओ रे आओ, ठंडी- ठंडी फुहारें , 

जाओ रे जाओ, गर्म- गर्म पवनें।

सजी महफिल है मेरी,

संजोए महबूब हैं मेरे।

शम्मा का रंग हो जैसे ,

शर्माया रुप हो वैसे ।

मैं झुम के, तुम घुम के,

पास आओ जरा रूक के।

मैं ठुमक -ठुमक के ,

तुम तुनक -तुनक के,

दूर जाओ जरा लुक के।

पतझड़ के झड़ते पत्ते,

कुछ ही पेड़ में सजते पत्ते।



Bhartinishi from kitabo ki duniya se ka ak suhawana aur sundar sa ahsaas....🤟🍁🍁🫶🍁🍁🥹


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