✍️मन का पंक्षी ✍️
✍️मन का पंक्षी ✍️
मन यूंही उड़ चला है ,
बिना सोचे- समझे बह चला है।
परवाह नहीं है इसको,
आज कल फिक्र कहां है किसी को।
दुनियादारी के झमेले से ,
आने वाले दिनों के बखेड़ों से ,
काश घूमूं मैं , काफी फिरूं मैं,
मगन हो जाऊं कभी ,
मस्त हो चाऊं कभी ।
ना ना अब बहाना न बनाओ ,
आना है तो आओ।
चाय की चुस्की , अपनों की थपकी,
बिस्कुट का मजा, सपनों का साथ,
ओ हो !क्या है कहना ...
आह !कितना है मौसम सुहाना।
काली घटा छाई हुई सी ,
अनोखे गीत गाती हुई सी,
मनभावन, मनलुभावन,
सुगंधित, सुशोभित ,
सारा जहां है खुशनुमा ,
सब हैं एक-दूसरे पर मेहरबान।
Bhartinishi from kitabo ki duniya se ka
मस्तमौला मौसम और सुहावना सफर का अनोखा मेल 🤞🌹🌼🌻🍁🍁🍂🍂🌿🌱☘️🍀🌴🌳🌞🫶
