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Manisha Wandhare

Abstract

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Manisha Wandhare

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पता है क्यों...

पता है क्यों...

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पता है क्यों...

जब हालात समझ से बाहर चले जाए,

लौटकर आनेवाले परिंदे ,

हमेशा के लिए उड़ जाए ,

अपना ही आसमान जब पराया हो जाए,

हालातों से लड़कर मन थक जाए,

तो उत्तर अपने आप मिल जाए,

पता है क्यों...

पहिले अंजान जरूर थे ,

कठिनाइयाँ कितनी थी लेकिन,

रास्तों की चाहत दिल में भरते थे,

परेशानियों से वो भागते नहीं थे,

जीने की चाहत मौत के परे थी ,

खामोशियों से जख्म भर जाते थे,

लाख गमों को छुपाए मुस्कुरा जाए,

नन्ही किलकारीयों में खो जाए ,

पता है क्यों...


बातों को आँखों से बयान करते,

ऐसे ही टाल देना वो समझ जाते थे ,

बड़ों की डांट भी अपनाकर ,

मन से सम्मानित उनको ,

हर रोज किया करते थे,

इसलिए शायद वो हर वक्त ,

मुस्कुराकर जीया करते थे ,

फूलों की खुशबु दिल में भर जाए,

किसी का पेट भर कर जो खुद भूखा रह जाए ,

पता है क्यों...

बाते दिल खोलकर होती थी,

किसी से मिलने की अपाईनमेंट,

भूलकर भी नहीं लेते थे ,

एक दूसरे को डिस्टर्ब करना,

बॅडमॅनर्स नहीं कहलाते थे,

जरूरत जब हो ,

दुश्मन भी दौड़कर आते थे ,

पता है क्यों...

इसीलिए शायद ,

अपनेपन का एहसास झुम जाए,

तब और अब में फर्क पड़ जाए,

हालातों से लड़कर मन थक जाए,

तो उत्तर अपने आप मिल जाए,

पता है क्यों...



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