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Govind Narayan Sharma

Romance

4  

Govind Narayan Sharma

Romance

प्रथम मिलन

प्रथम मिलन

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वो चांदनी उजियारी रात मन में अनकही बात ,

तुझसे नजरें झुका सहमी पहली मुलाकात! 

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वो चञ्चल निगाहें सधे हुए शब्द अनमोल, 

मिलन उत्कंठा से लरजते रक्तिम कपोल!

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हिमकणों से रात जम गयी धरा ने ओढ़ी मोती चुनर,

दमक रही शबनम की बूंदे भू पर सितारे बनकर

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दरख्तों को ढक दिया कोहरे ने बन चादर श्यामल, 

दिनकर की किरणों ने होले से चुग लिए मुक्ताफल!

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आज सुबह की धूप सुहानी गुनगुनी थी, 

तेरी यादों भी बड़ी मधुर मखमली थी !

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जुल्फ खुली गजरे की महक भीनी भीनी थी, 

रुखसार पर गिरी शबनम की बून्द मोती सी थी।


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