STORYMIRROR

Nandita Tanuja

Abstract

4  

Nandita Tanuja

Abstract

परोपकार ------!!

परोपकार ------!!

1 min
455

परोपकार से बड़ा कोई धर्म नहीं

स्वार्थ युग में विलीन हो गया कहीं....!!


दूसरों की कब सुने यहां कोई

मानवता को निभाये बस यूं ही...

प्रेम के दो टूक ऊपरी मन से कह

परोपकारी सब बन जायेंगे यही.....


व्यंग्य औ कटाक्ष भाव मन में लिए

स्वयं के हित का साथ प्रलोभन लिए

वाणी की चाटुकारिता ही रास आती

जीवन का मूल -मंत्र संग शून्य लिए....


दुख, क्या, दुखी कौन अब प्रश्न यही

दुनिया की भीड़ में लुप्त गरीब कहीं

न आटा मिले, न दाल औ न चावल

धनी गर गरीब को लूटे सामर्थ्य ढही ...


मौन हैं संसार मौन हैं संवेदनाएं कहीं

परोपकार हैं धर्म औ यही कर्म नहीं

झूठ, पाप, स्वार्थ अहिंसा का अंत हो

परोपकार का कर्म मन समझे धर्म यही


नंदिता हाथ जोड़ ईश्वर से विनती करे....

परोपकार के लिए सदैव शुद्ध मन की दे सबको भावना......!!



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract