पर्णकुटी के पहरेदार
पर्णकुटी के पहरेदार
अयोध्या छोड़ वनवासी राम हुए
चित्रकूट में ललित पर्णकुटी छाई,
एक लघु एक विशाल तृन निकेत
शोभित जिसमें प्रभु जानकी समेत।
गोलक लखन बिलोल बिलोचन
निशिदिन जागत प्रभु सेवा में,
निद्रा का कर दिया सहर्ष त्याग
निशिदिन पहरा प्रभु सेवा में।
कठिन तपस्या के व्रतधारी
सतत जागरण से पहरेदारी ,
अपना सुख चैन नहीं जाना
कष्टों को कष्ट नहीं माना।
उर्मिला जैसी पत्नी प्रिय पाई
उसे भी छोड़ नहीं देर लगाई,
भाई राम संग वन में चले आए
सब सुखों का त्याग कर आए।
तुम्हीं प्रभु गुरु पितु माता
नहीं किसी से कोई नाता,
सब सुख तुम्हारी सेवकाई
अद्भुत लक्ष्मण जैसा भाई।
