परमानन्द
परमानन्द
अन्तरिक्ष की कोई सीमा ना
लाखों सूर्य, तारागण से भरा
उसकी धूल का एक छोटा कण
ये पृथ्वी, जिस पर है तू खड़ा ।
ब्रह्माण्ड का विस्तार असीम है
तू नाप रहा अपने घर को
करोड़ों ग्रह धरती जितने वहाँ
बड़ा कहे तू अपने शहर को ।
ऐंठ रहा बड़ा पद तू पाकर
निर्धन को तू छोटा माने
लाखों राजा, महाराजा आए
आख़िर मिल गए इसी मिट्टी में ।
जीवन तो एक बहती धारा
समय किसी के लिए रुका ना
बचपन गया, जवानी आयी
बुढ़ापा राह देखे मृत्यु का ।
नया जन्म होता है और फिर
जन्म - मृत्यु का चले चक्र ये
ऊपर से है जगत चला रहा
जगतपति अपनी मरजी से ।
तू समझे सब कर रहे तुम हो
तुमसे तिनका भी हिल ना पाए
कण कण में वो विद्यामान है
उसकी ही सारी माया ये ।
वो ऊपर बैठा खेल रहा
तू तो बस कठपुतली जैसा
जो वो चाहे, वो हुक्म दे
करता रहता है तू वैसा ।
धन, सम्पत्ति के पीछे भागे
मनुष्य जीव ये कितना मूढ़ है
संत लोग सब यही समझाएँ
गाँठ बाँध लो, ज्ञान ये गूढ़ है ।
किसी ने इनसे सुख ना पाया
सभी जानें, पर नहीं समझते
पुण्य ही तेरे साथ जाएगा
ना धन जाए और ना सम्पत्ति ये ।
कर्म करो कि मन शान्त हो
परमानन्द में रहो तुम सदा
ना कोई सुख है, ना कोई दुःख है
बड़ी ही सुन्दर ये अवस्था ।
ये अवस्था पा ली है जिसने
वो संत है, वो लीन प्रभु में
मन की स्थिति ऐसी ही चाहूँ
माँगूँ मैं बस यही हरि से ।
