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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

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परमानन्द

परमानन्द

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अन्तरिक्ष की कोई सीमा ना 

लाखों सूर्य, तारागण से भरा 

उसकी धूल का एक छोटा कण

ये पृथ्वी, जिस पर है तू खड़ा ।


ब्रह्माण्ड का विस्तार असीम है 

तू नाप रहा अपने घर को 

करोड़ों ग्रह धरती जितने वहाँ 

बड़ा कहे तू अपने शहर को ।


ऐंठ रहा बड़ा पद तू पाकर

निर्धन को तू छोटा माने 

लाखों राजा, महाराजा आए 

आख़िर मिल गए इसी मिट्टी में ।


जीवन तो एक बहती धारा

समय किसी के लिए रुका ना 

बचपन गया, जवानी आयी 

बुढ़ापा राह देखे मृत्यु का ।


नया जन्म होता है और फिर 

जन्म - मृत्यु का चले चक्र ये 

ऊपर से है जगत चला रहा 

जगतपति अपनी मरजी से ।


तू समझे सब कर रहे तुम हो 

तुमसे तिनका भी हिल ना पाए 

कण कण में वो विद्यामान है 

उसकी ही सारी माया ये ।


वो ऊपर बैठा खेल रहा 

तू तो बस कठपुतली जैसा 

जो वो चाहे, वो हुक्म दे 

करता रहता है तू वैसा ।


धन, सम्पत्ति के पीछे भागे 

मनुष्य जीव ये कितना मूढ़ है 

संत लोग सब यही समझाएँ 

गाँठ बाँध लो, ज्ञान ये गूढ़ है ।


किसी ने इनसे सुख ना पाया 

सभी जानें, पर नहीं समझते 

पुण्य ही तेरे साथ जाएगा 

ना धन जाए और ना सम्पत्ति ये ।


कर्म करो कि मन शान्त हो 

परमानन्द में रहो तुम सदा 

ना कोई सुख है, ना कोई दुःख है 

बड़ी ही सुन्दर ये अवस्था ।


ये अवस्था पा ली है जिसने 

वो संत है, वो लीन प्रभु में 

मन की स्थिति ऐसी ही चाहूँ 

माँगूँ मैं बस यही हरि से ।


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