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Gajanan Pandey

Abstract

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Gajanan Pandey

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प्रकृति

प्रकृति

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जब रिश्तों में मर्यादा हो

व्यक्ति के मन में संयम

प्रकृति से सीखें मित्रता

तो जीवन में खुशहाली हो।


जब से बढ गया है लोभ

अहंकार हावी है मन में

प्रकृति के विरुद्ध जाकर

हमने दी है विनाश को दावत।


अब देख अपनी हालत

सब कर्मों का फल है

अब भी संभल जा पगले

ईश्वर के हाथ सब है।


कविता के संबंध में 10 शब्द -

प्रकृति मित्र बनकर

लोभ व अहंकार त्याग दे।

मर्यादा में खुशहाली है

सब ईश्वर के हाथ है।


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