प्रकृति से नाता हमारा
प्रकृति से नाता हमारा
प्रकृति से नाता हमारा, गहरा अटूट।
नहीं कोई नकार सकता, नहीं कोई छूट
पर्यावरण धरती का क्यों हुआ अशुद्ध,
लापरवाही हमारी भूल गए सब कुछ।
यह पेड़ पौधे वृक्ष, खिले खिले वन उपवन।
मलय पवन संदेश लाए, महकाये घर आंगन।
झरनें, नाले, नदियां बह कर, करते मन प्रसन्न।
उर में रख प्रज्वलित ज्वाला, अमृत जल का भंडारण।
गर्मी की तपती दोपहर में मिलती हमें छांव,
बच्चे भी डाल झूला, वन विहार करते गांव गांव।
क्यों सब तड़प रहे, वातावरण बिगड़ रहे।
रुठी रुठी सी हवायें, गुम हुई मौसमी बारिशें।
विनाश की ओर बढ़े कदम, खोखले वादे, हुए सारे हजम।
पर्यावरण का बिगड़ा संतुलन ,हिला हराभरा आवरण।
आओ सब मिल, उठायेंगे बीड़ा, करेंगे साज सम्हाल, ले प्रतिज्ञा आमरण।
