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Govind Narayan Sharma

Fantasy

4  

Govind Narayan Sharma

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प्रकृति नटी

प्रकृति नटी

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अनन्त व्योम में रही सोमपति रश्मियाँ बिखर,

उजळी उजळी कामिनी सी धरा रही निखर ! 


चकवी की प्रीति पाकर चकोर मन विभोर,

पूनम में ज्यों रत्नाकर में उठी सुनामी हिलोर !


हर डाली नव कुसुमित की सजी दुकूल ओढ़,

 लता गुल्म से लदी इळा का आँचल बेजोड़ ! 


चन्द्र रश्मियों से पयस्विनी पय मानो ले रही, 

चन्द्र मयूख से धरा नयनाभिराम दमक रही ! 


भू अम्बर में चहुँओर चारु चन्द्र की बही घटा ,

भोर का भानु गगन में बिखेरता रतनार छटा !


शांत सरोवर में कमलिनी नवल विकस रही,

नर्तन निमग्न खग वृन्द कलरव किलक रही !


बरस रही भू पर ज्योत्स्ना सोमरस सुप्रीति,

वसुंधरा पाकर चन्द्र अमृत बिन्दु निखरती !


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