प्रकृति नटी
प्रकृति नटी
अनन्त व्योम में रही सोमपति रश्मियाँ बिखर,
उजळी उजळी कामिनी सी धरा रही निखर !
चकवी की प्रीति पाकर चकोर मन विभोर,
पूनम में ज्यों रत्नाकर में उठी सुनामी हिलोर !
हर डाली नव कुसुमित की सजी दुकूल ओढ़,
लता गुल्म से लदी इळा का आँचल बेजोड़ !
चन्द्र रश्मियों से पयस्विनी पय मानो ले रही,
चन्द्र मयूख से धरा नयनाभिराम दमक रही !
भू अम्बर में चहुँओर चारु चन्द्र की बही घटा ,
भोर का भानु गगन में बिखेरता रतनार छटा !
शांत सरोवर में कमलिनी नवल विकस रही,
नर्तन निमग्न खग वृन्द कलरव किलक रही !
बरस रही भू पर ज्योत्स्ना सोमरस सुप्रीति,
वसुंधरा पाकर चन्द्र अमृत बिन्दु निखरती !
