प्रेम तो समर्पण की संहिता है
प्रेम तो समर्पण की संहिता है
हृदय के किंचित कोर कोर में,
सुंदर भाव हैं मन के ओर छोर में !
सुन्दर शब्द मुस्काते हैं मंद- मंद,
कभी रूबइयां तो कभी छंद छंद !
प्रेम तो समर्पण की एक संहिता है,
प्रेमी का सान्निध्य तो एक वनिता है !
जब मन भाव में प्रेम भाव सिरजता है,
उसी का एक सुन्दर नाम तो कविता है !
प्रेम कभी किसी बाड़ी में नहीं उपजता है,
प्रेम तो सदा प्रेमी के हृदय में ही पनपता है !

