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V. Aaradhyaa

Romance Fantasy

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V. Aaradhyaa

Romance Fantasy

प्रेम तो समर्पण की संहिता है

प्रेम तो समर्पण की संहिता है

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हृदय के किंचित कोर कोर में,

सुंदर भाव हैं मन के ओर छोर में !


   सुन्दर शब्द मुस्काते हैं मंद- मंद,

    कभी रूबइयां तो कभी छंद छंद !


प्रेम तो समर्पण की एक संहिता है,

प्रेमी का सान्निध्य तो एक वनिता है !


     जब मन भाव में प्रेम भाव सिरजता है,

     उसी का एक सुन्दर नाम तो कविता है !


 प्रेम कभी किसी बाड़ी में नहीं उपजता है,

 प्रेम तो सदा प्रेमी के हृदय में ही पनपता है !



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