STORYMIRROR

Kusum Lakhera

Classics Inspirational

4  

Kusum Lakhera

Classics Inspirational

प्रेम शुद्ध भाव !

प्रेम शुद्ध भाव !

1 min
294

सुनो लड़कियों प्रेम वह नहीं 

जो बाह्य है

प्रेम वह नहीं

जो अधजल गगरी

की तरह छलकता है


प्रेम तो शुद्ध भाव है

अनुभूति है संवेदना है

वह सिर्फ़ आकर्षण नहीं

वह उथला नहीं

वह गहरे सागर सा गहरा 

वहाँ नहीं कुछ तेरा मेरा

नहीं वहाँ विद्वेष या छल

वह बहती सरिता सा कल कल जल !


वह झील का सुंदर कमल

वह गूंगे के गुड़ सा निर्मल

शब्दों से न कह पाओ ऐसी गजल

प्रेम तीन घन्टे की बॉलीवुड की कहानी नहीं

वह तो मीरा की भक्ति सा !


तुलसी की चौपाई सा !!

सुर के कान्हा सा, गोपियों के विरह सा

भक्त के लिए भगवान सा

जिज्ञासु के किए ज्ञान सा

दीपक की ज्योति सा उज्ज्वल

कल कल बहती लोकमाता गंगा सा पावन


हरिश्चन्द्र के सत्य सा 

श्रवणकुमार सा पितृभक्त 

नहीँ रूप पर आसक्त 

वह नहीं वासना का भक्त

वह तो परम् आत्मास्वरूप निःस्वार्थ भाव !


वह तो निर्गुण परमब्रह्न समान

नहीं व्याख्या सम्भव हो पाए 

प्रेम शब्द में सृष्टि समाए !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Classics