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Goldi Mishra

Inspirational

4  

Goldi Mishra

Inspirational

पोटली

पोटली

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करूँ सब्र या अब बस करूँ,

रुकूँ मैं या फिर चलता रहूं,

क्या अनसुना कर दूँ उस शोर को,

या तोड़ दूँ अपने ही मौन को,

आस आस में भटका हर कोई,

तरस में तड़प कर बैरागी बन गया है कोई।।


अभी दूर है मंजिल रास्ता लम्बा है काफी,

सूरज ना जाने कब आए ये रात है अंधेरी,

फांस घुसी है पैरों में मिले कटोरा पानी का तो

इसको मैं धो लूँ,

चलो छाऊँ में थोड़ी देर आराम कर लूँ,

आस आस में भटका हर कोई,

तरस में तड़प कर बैरागी बन गया है कोई।।


खुली आंख जो मेरी मैंने व्यापारी को देखा,

उसने मेरी खाली पोटली की ओर देखा,

उसने पूछा क्या बेचने क्या खरीदने निकले हो,

मैंने कहा सब बेच आया हूं अब कुछ तो खरीदने निकला हूं,

आस आस में भटका हर कोई,

तरस में तड़प कर बैरागी बन गया है कोई।।


छल कपट और फरेब बस यही मिला,

पोटली छीन ले जाने वाला हर कोई मिला,

अपना अपना सबने देखा,

मेरा निशानों से भरा पैर किसी ने ना देखा,

आस आस में भटका हर कोई,

तरस में तड़प कर बैरागी बन गया है कोई।।

चलो अब पैरो को छुपा कर ही रखते है,

सिर की शिकन को भी दबा ही लेते है,

किस्सा क्या था चलो वो भी भुला दे,

पुराने शख़्सियत का चोला उतारे और एक नया सिलवा ले,

आस आस में भटका हर कोई,

तरस में तड़प कर बैरागी बन गया है कोई।।



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