पिता
पिता
पिता वो है जो
महसूस न होने दे दर्द के कतरे
और अश्रु अपने सुत-सुताओं के पी जाएं।
पथरीली राह पर मखमल बिछा
नुकीले पत्थरों की चुभन
मुस्कुुुराते हुए सह जाएं।
कितने भी तुफान आएं
अपने पितृृृृत्व भाव से
उनकी नैया निकाल ले जाएं ।
उनकी जननी को सम्मान दे
उन के हृदय में
ईश्वर- से स्थापित हो जाएं ।
बस !बीज रोपित कर
पिता का फर्ज पूर्ण न करें,
बल्कि माली बन,
संघर्षमय जीवन में
फूल-सा खिलना सीखा जाएं।
अपने कर्मों द्वारा
पिता की सीख बन
उनके व्यक्तित्व पर अंकित हो जाएं।
अपने अहम को मार ,
अपने तनय-तनया के
कोमल अनुुुुराग को गर्वित कर जाएं।
