STORYMIRROR

अजय गुप्ता

Abstract

4  

अजय गुप्ता

Abstract

पीपल पर्णिका

पीपल पर्णिका

1 min
588

अत्यंत कोमल,

धानी कोपलें

कुछ परिपक्व

पीपल के पर्ण।


कुछ कम्पन

फिर नर्तन

स्व करतल

फिर वर्तन


कुछ पर्ण

हवा संग

जाने कहां

उड़ चले।


ना उन्हें मोह

ना कोई विछोह

अनंत गगन

आत्ममुग्ध पर्ण।


किरण को सहेजती

धरा पर बिखेरती

कुछ घनी धूप से

खेलती पर्णिका।


कोयल भी आती

कोई धुन गुनगुनाती

भवरों को बुलाती

नाचती पीपल पर्णिका।


घन से भी घनी

शाखाओं से जुड़ी

पथिको को छांव देती

पीपल की महान पर्णिका।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract