फर्ज
फर्ज
भूल चुका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज,
नहीं रहा है दिल में किसी के पहले वाला दर्द।
चलते फिरते इन्सान लगते सबको प्यारे,
सभी दिखाते रिस्तेदारी करते खूब नजारे।
भूल जाते हैं जब, विपत्ति के दिन आते,
हाल चाल तो पूछना क्या,
फोन तक नहीं उठाते, कहां गया वो भाईचारा,
कहां गया वो दर्द, भूल चूका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
नहीं देखने को मिलता ढलती उम्र में किसी को प्यार,
तोड़ देते हैं सब वन्धन बेटा, भाई हो या रिश्तेदार,
दिखता है असहाय सब को जैसे सर पर कर्ज,
भूल चुका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
पड़ जाए विमार वूढ़ा तो बहुत कम पूछें हाल,
कहां गए भाई, बन्दु सब जिनका था पहरेदार,
कहां गई वो रिश्तेदारी कहां गया वो दर्द,
भूल चुका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
मां बाप अपनें बच्चों को लाड प्यार से पाले,
लेकिन बूढ़े होने पर कोई न उन्हें संभाले,
कैसा यह दौर चला है कैसा हो रहा अनर्थ,
भूल चूका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
कहे सुदर्शन सुनो यह सारे, भाईचारा ऐसा निभाएं,
इन्सान को हम सब इन्सान ही समझें, अपना धर्म निभाएं,
करो मदद हर किसी की,
रहे न किसी को कोई दर्द,
भूल चूका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
सभी को दो शिक्षा लगन की, सभी को यह समझाओ,
सेवा करो मरते दम तक सबकी,
अच्छे पुन्य कमाओ,
इससे बड़ा तीर्थ नहीं कोई न कोई पर्व,
भूल चुका है आज का इन्सान अपना अपना फर्ज।
