STORYMIRROR

Nalanda Satish

Tragedy

4  

Nalanda Satish

Tragedy

फिर भी मैं पराई हूं

फिर भी मैं पराई हूं

1 min
366

बाबा की प्यारी परी थी

माँ की राजकुमारी थी

लाड प्यार मे पली 

भैय्या की लाडो रानी थी 

जिद की पुरी पक्की थी

बाबा ने एक सिख सिखलायी 

हक और अधिकारों की दी है दुहाई

लडकी लडके मे ना कोई भेद किया

समानता का पाठ किया 

बड़े होने की सजा मिली

ब्याह कर ससुराल गयी

कदम कदम पर अस्वीकारी गयी

ख्वाहिशें दमित होती गयी

बात बात पर दुत्कारी गयी 

समझा था अपना परिवार 

बस महरी बनकर रह गयी

उम्र गुजर गयी सेवा में 

फिर भी पराई ही रह गई 

पीहर छुटा 

बुनियादें  लेकिन वही रही

काटकर जड़ों को मेरी 

गैरो के आँगन मे गाड़ दी गई

आशाएँ अभिलाषायें दम तोडती गई

कहने को जिन्दा भर थी

पल पल मैं मरती रही 

नन्हे की तरह चिपकी रही मुसीबतें

आसुओं ने बहती धार ना छोड़ी 

अपनाती रही मैं गैरो को

फिर भी पराई बनी रही

दोनो दहलीजों को संभालते संभालते 

मै खुद ही सरहद बन गई 

सींचा खुन से अपनों को

फिर भी पराई बनी रही



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from Nalanda Satish

Similar hindi poem from Tragedy