फिर भी मैं पराई हूं
फिर भी मैं पराई हूं
बाबा की प्यारी परी थी
माँ की राजकुमारी थी
लाड प्यार मे पली
भैय्या की लाडो रानी थी
जिद की पुरी पक्की थी
बाबा ने एक सिख सिखलायी
हक और अधिकारों की दी है दुहाई
लडकी लडके मे ना कोई भेद किया
समानता का पाठ किया
बड़े होने की सजा मिली
ब्याह कर ससुराल गयी
कदम कदम पर अस्वीकारी गयी
ख्वाहिशें दमित होती गयी
बात बात पर दुत्कारी गयी
समझा था अपना परिवार
बस महरी बनकर रह गयी
उम्र गुजर गयी सेवा में
फिर भी पराई ही रह गई
पीहर छुटा
बुनियादें लेकिन वही रही
काटकर जड़ों को मेरी
गैरो के आँगन मे गाड़ दी गई
आशाएँ अभिलाषायें दम तोडती गई
कहने को जिन्दा भर थी
पल पल मैं मरती रही
नन्हे की तरह चिपकी रही मुसीबतें
आसुओं ने बहती धार ना छोड़ी
अपनाती रही मैं गैरो को
फिर भी पराई बनी रही
दोनो दहलीजों को संभालते संभालते
मै खुद ही सरहद बन गई
सींचा खुन से अपनों को
फिर भी पराई बनी रही
