पहाड़ और मैं
पहाड़ और मैं
कहते हैं पहाड़ मेरे
आ लौट के आ जा
आ सूरज की किरणों में
अपनी मुस्कुराहट घोल जा
ये वादियाँ पुकारती हैं तुझे
आ अपना बचपना लेकर
मेरे आगोश में समा जा
कुछ तो है तेरे और मेरे दर्मियाँ
पहाड़ हूँ मैं और मेरा आँचल घिरा है
इन हरे भरे वृक्षों से, महक़ता हूँ मैं इन
हौले - हौले मचलती चलती हवाओं से
तेरी मुस्कान का साथी हूँ मैं
आ अब शहरों को छोड़ लौट कर आ जा ।।
