पार्क की एक शाम
पार्क की एक शाम
पब्लिक पार्क की शामें बड़ी रंगीन होती है
पार्क में बैठी कुछ नजरें बड़ी संगीन होती हैं
हर आती जाती महिला को घूरती हैं
वीडियो कैमरे सी यहां वहां घूमती हैं
रंग बिरंगे कपड़े रंगीन मिजाज
सबके होते अलग अलग अंदाज
कोई सैर सपाटा करने अकेले आया है
कोई परिवार को पिकनिक पर लाया है
बच्चे यहां वहां खेल रहे होते हैं
फिसलपट्टी और झूला झूल रहे होते हैं
कोई घास पर बैठ आनंदित है
कोई बैंच पर बैठ प्रफुल्लित है
मजदूर घास काट रहे हैं
माली पेड़, पौधे सींच रहे हैं
फूल मुस्कुरा रहे हैं
पत्ते खिलखिला रहे हैं
पंछी पानी में नहा रहे हैं
पानी पीकर चहक रहे हैं
श्रमिक हर आते जाते को देखते हैं
अपने मन ही मन सोचते हैं
हम रोटी कमाने आये हैं
ये मन बहलाने आये हैं।
कोई मोबाइल में व्यस्त है।
कोई परिवार संग मस्त है।
कोई चित्र ले रहा है।
कोई पोज दे रहा है।
कोई बैठा है कोई लेटा है।
कोई मित्र से सटा बैठा है।
धीरे धीरे सूरज ढलने लगता है।
उजाला सिमटने लगता है।
बच्चों संग आये,
परिवार लौटने लगते हैं ।
दोस्त संग आये,
सटकर बैठने लगते हैं।
धीरे धीरे पब्लिक,
उठ कर चलने लगती है।
पार्क की हसीन दुनिया,
सिमटने लगती है।
चौकीदार सीटी बजाता है।
पार्क खाली हो जाता है।
पब्लिक के जाते ही,
पार्क में शांति छा जाती है
अंधेरा गहराते ही
प्रकृति सो जाती है।
