ओ वसुंधरा
ओ वसुंधरा
आसमां है रिक्त अभी,,,
संतोष तुझपे ही मिले मुझे,,,
गिरता – उठता मैं बड़ा हुआ,,,
तेरी ही इस धूमिलता में,,,
तुम अभी भी वहीं ;
सुनहरी हो,,,,
पग धरते ही ;
आराम मिले,,,,
तेरे कांकर – पाथर तो,,,
चुभन अभी भी देते हैं,,,
तेरे कारण ही मैया,,,,
आनंद अनोखा देते हैं,,,
गिनता हूं;
भूल ही जाता हूं,,,
कितना तूने है;
हमें दिया ,,,
वन – उपवन और पहाड़,,,
जन – जनता और घर द्वार,,,
अनगिनत और असंख्य दिया है,,,
मेरे मन में प्रश्न भरे हैं,,,
तुम कितना भार उठाती हो,,,
ओ वसुंधरा कैसे ?
यह कर पाती हो !
