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Uma Sailar

Others

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Uma Sailar

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अल्हा की गुमठी

अल्हा की गुमठी

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अल्हा ले आ कितनी देर लगाता है

आया अम्मा

बस तनिक सब्र कर

सिर पर लकड़ी का गट्ठर

हाथों में बरसाती टांगे


आया अल्हा....


लो अम्मा ! 

बनवा दो मेरी गुमठी अच्छी


तुझको न है – समझ ज़रा भी 

मेहनत मेरी जाएगी खाली


सुन अल्हा ... मान भी जा...

घर चल वहीं खेंलना खाना...


देखो अम्मा....


ये मेरी मनकी है

इस पर यूं ना फेरो पानी

खड़ी करो तुम गुमठी जल्दी


खेत की काली माटी की...

चार दीवारें इक दरवाज़ा

छत लकड़ी बरसाती की


अल्हा ले तैयार हो गई....

तेरी गुमठी छोटी – सी


वाह अम्मा...

क्या काम किया है 

बस अब लीप पोत दो तुम 

मैं हाट से होकर आता हूं


टूटी फूटी गड़गड़िया लेकर

अल्हा चला गया बाज़ार

क्या बच्चों क्या बूढ़ों की

लगा उठा लाया बाज़ार....


पहुंचा जब गुमठी के पास

गुमठी से निकली अम्मा

देख के गड़गड़िया की हालत

अम्मा की आंखें खुली – खुली


हे राम !

क्यों रे अल्हा....

एक महीने का राशन भी 

इतना ज्यादा नहीं हुआ 

लगता है आज हाट की हाट उठाकर लाया है

बस... बस... अम्मा रहने भी दो 

चलो अभी तो काम बहुत है 


अल्हा ने समान जमाया 

न छोड़ा इक भी कोना 

केसर दादू ने देखा....


अरे! 

अल्हा क्या तू ही है ?

क्या तेरी ही है ये गुमठी ?


हां दादू ...

मैं ही तो हूं

मेरी ही है ये गुमठी।


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