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minni mishra

Abstract

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minni mishra

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ओ..माँ

ओ..माँ

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ओ माँ !

लेखनी की स्याह में

शब्द पिरो रही हूँ।

अधजली कागज पर,

भावना उकेर रही हूँ।


कोख को निचोड़कर

तूने कचरे में

मुझे फेंक दिया !

क्या कसूर था मेरा,

जो मौत में धकेल दिया ?


कैसी जननी हो ?

किस-किस से डर रही हो ?

अपनों से या

अपनी उस परम्परा से ?


जो स्वर्ग नरक का

द्वार दिखाती !

बेटा-बेटी में

भेद सिखाती i


कभी कंस भी

बेटी की हत्या से थर्राया था

हाँ, रावण भी

सीता-हरण से घबराया था ।


माँ तुझे भी

हत्या का पाप लगेगा !

मेरे खोने का कुछ तो

पश्चाताप रहेगा ?


विश्वास करो माँ,

मैं सती,

सावित्री और सीता बनूँगी

गार्गी, मैत्रयी और

इंदिरा दिखूँगी।


बस, एक बार,

एक बार मुझे आने दे

माँ अपनी बाहों में

मुझे सोने दे।


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