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Dron Sahu

Abstract

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Dron Sahu

Abstract

ओ हवा !

ओ हवा !

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ओ हवा !


तुम अभी भी,

यहाँ बह रही हो ?


इंसान की हरकतें,

क्यों सह रही हो ?


प्रदूषण से तुम्हारा,

दम घुट रहा।


फिर भी यहाँ तुम,

क्यों रह रही हो ?


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