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Rekha Verma

Children

4  

Rekha Verma

Children

नटखट बंदर

नटखट बंदर

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नटखट बंदर मस्त कंलन्दर

चुपके से आया घर के अंदर

अपनी शेतानी मे था धुरन्दर

एक नजर उसने घर पर डाली

देखी उसने रसोई हमारी

झटपट उसने कुण्डी खोली

पलभर मे किचन खंगाली

दिखा था उसको फ्रिज हमारा


जिस मे भरी थी रसमलाई

और मीठी सी जलेबी गदराई

उसको खाकर पेट की भूख मिटाई

और शरारत की अक्ल दौड़ाई


कुदते फादते फुलवारी आ पहुँचा

जिस मे सजे थे पुष्प हमारे

सुन्दर सुन्दर फुल हमारे

कुछ को खाया कुछ को नोचा


पुष्प वाटिका मे आतंक मचाया

कुछ को तोडा कुछ को फोड़ा

छत पर रखे कपडो को ना छोड़ा

शौर शराबा सुन पापाजी आये


लकड़ी से उसे मार भगाये

फिर कभी ना वो बंदर आया

जान बचाकर जिन्दगी पाया।


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