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Vikram Choudhary

Children

4  

Vikram Choudhary

Children

बचपन

बचपन

3 mins
315


क्या दिन थे जब हम खो खो में 

बन्दर से उछला करते थे  

और बीच सड़क में कंचों के 

हम गड्ढे खोदा करते थे  

अब पब जी वाली दुनिया में 


खो खो कहाँ खेला जाता है  

गूगल के रंगीं गोले में 

कंचा मेरा खो जाता है  

वो खेल पुराना खो खो का 

अब भी मुझको दौड़ाता है  

वो गोल सा कंचा बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


उस वी सी आर के आने पर 

कैसे हम न्यौता देते थे  

कमरा सारा भर जाता था 

सब चुप्पी साधे रहते थे  

अब इंटरनेट है मुट्ठी में 

न्यौता फ़ेसबुक पर आता है  


फ़िल्में लाखों मोबाइल में हैं 

कमरा खाली रह जाता है  

वो वी सी आर में कैसेट का 

फँसना अब तक तरसाता है  

वो कमरा अपने बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


पापा की मार के डर से हम 

आलार्म बिना उठ जाते थे  

जाना होता था रोज़ मगर 

स्कूल से हम थर्राते थे  

अब सोते सोते बेबी यूँ 

पूरा रेडी हो जाता है  


इस पिकनिक जैसे स्कूल में 

बच्चा जाने को ललचाता है  

आलार्म कहाँ अब पापा का 

मुझे तड़के रोज़ जगाता है  

वो डर मासूम सा बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


होती थी शाम तो आँखों से 

सिग्नल सबको मिल जाते थे  

एक टोल में सारे मिल करके 

गालियाँ सारी नाप आते थे  

अब शाम हुई तो ट्यूशन का 

सिग्नल टेंशन दे जाता है  


और टोल है मेरा व्हाट्सएप पर 

जो दुनियाँ भर नाप आता है  

वो तेज़ इशारा आँखों का 

मुझको अब तक मचलाता है  

वो टोल भयंकर बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


तब गर्मी में सबके बिस्तर 

छत पर एक लाइन से लगते थे  

बचने को आख़िरी बिस्तर से 

हम बीच की राह पकड़ते थे  

अब छत पर सोता कोई नहीं 


कमरा सबका ठण्डहाता है  

डर फुर्र है आख़िरी बिस्तर का 

अब सेपरेट रूम मिल जाता है  

अब जून महीना गर्मी का 

छत पर सूना रह जाता है  

वो बिस्तर लम्बा बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


क्या दिन थे जब अपने कुटने का

डंडा हम ही लाते थे  

खर्चे को मिलते पाँच रुपये 

उसमें भी कुछ बच जाते थे  

अब ऊँगली भर लग जाने पर 


टीचर ससपेंड हो जाता है  

और सौ का नोट भी पिज़्ज़ा के 

ऑर्डर में कम पड़ जाता है  

वो डंडा अब भी कभी कभी 

सपनों में छप सा जाता है  

वो बचा रुपैया बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


तब दादी माँ के चश्मे से 

बादल सतरंगी दिखते थे  

और चूल्हे वाली राख के आलू 

खाने को हम लड़ते थे  

अब दादी माँ के चश्मे से 


बादल कुछ धुँधला दिखता है  

और स्वाद राख के आलू से 

बेहतर सैंडविच में आता है

दादी का चश्मा उतर गया 

अब उनको कुछ ना दिखता है  

लेकिन वो आलू बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है  


वो दिन थे जब हम प्रेम पत्र भी 

प्रार्थना पत्र सा लिखते थे  

और उत्तर पाने को उसके 

पीछे महीनों तक फिरते थे  

अब प्रेम, पत्र के बदले 


इंस्टाग्राम पे ज़ाहिर होता है  

और उत्तर लड़की का 

इनबॉक्स में हार्ट शेप में आता है  

लेकिन अब भी काग़ज़ पर मन 

जाने क्या क्या लिख जाता है  

वो प्रेम सुहाना बचपन का 

मुझे बचपन याद दिलाता है। 


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