नसीब
नसीब
ए ख़ुदा मुझको ये बता
क्यों रूठा है तू मुझसे
जब मैंने नहीं की तेरी कोई ख़ता
माँगा था तुझसे अपने नसीब में उजाला
तूने तो गज़ब कर डाला
मेरा नसीब भी किसी और को दे डाला
फिर भी मुझ बेगुनाह को
गुनाहगार बना डाला
वक़्त - बेवक़्त हम तो बैठे रहे
लेकर नसीब तेरा नाम आसरा
कभी ना सोचा था कि
तुझमे - मुझमे होगा इतना फ़ासला
कोशिश की भी और नहीं भी
तरक्की तेरी राह पर जाने की
फिर मात खा गये और कह बैठे
मेरे नसीब में ही लिखा था
खुद के सवालों के खुद ही जवाब दे डाले
फरमाइश की तुझसे मेरे खुदा बहुत
कि तू मेरे नसीब को लाज़वाब बना डाले
कभी देखते तुझको और कभी देखते उसको बंद आँखों से
क्या ऐसा हुआ है कभी कि किसी के अधूरे ख़्वाब भी
उसके नसीब में जान डाले
ये सब सोचते - सोचते ना जाने मैंने कितने साल गुजारें
ना मिली मंज़िल ना साहिल मिली ठोकर पर ठोकर
लग गये सारे होश ठिकाने
अब बचे ना ऐसे कोई बहाने कि कब तक लेते रहेंगे
मेरे नसीब तुझे निशाने
कल नहीं तो आज आना होगा इसी नियम पर
कर्ता तेरे कर्म ने ही तो
तेरे नसीब बनाने तेरे नसीब बनाने
अब सब मैं समझ गया कुछ ना नसीब तेरे पास
जो करेगा श्रम तू तो होता
उसके पास तू तो होता उसके पास
साधु - संतों के वचन में भी मैंने ये पाया है
जो करे जी - तोड़ मेहनत
धन - वैभव - सफलता सब कुछ उसने पाया है
ये नसीब भी तो श्रम ने ही बनाया है
श्रम ने ही बनाया है।
