नज़रबंद धूप
नज़रबंद धूप
उसने थोड़ी सी धूप
नजरबंद कर रखी है
जब सील जाएगी वो
दर्द की तह तक,
तब ओढ़ लेगी उसे
ठीक वैसे ही जैसे
आँखो से लबों तक
हँसी का हिजाब
पहनकर रखती है।
अंदर से पूरी तरह
टूटी होने के बावजूद
सुखा लेगी सीलन को,
क्योंकि अब वो और वजह
नहीं देना चाहती किसी को
कि उसकी सिमटी खोखली
दरारों को कोई खुरचता जाए,
और वो रह जाए
बदरंग दीवार की भाँति
जिसे बस इंतजार होता है
अपने ढह जाने का।
