STORYMIRROR

ज्योति किरण

Abstract

2  

ज्योति किरण

Abstract

निश्छल भाव

निश्छल भाव

1 min
509

जीवन की रेखा निश्छल सी..

बदले स्वरूप यह पल-पल ही।


कभी माँ के रूप में ढल जाती,

कभी बालक जैसी चंचल भी।


हाथों में सजे और मस्तक पर,

शोभा बढ़ाए हर आँचल की।


कभी शांत सरोवर सी बहती..

कभी सागर जैसी कलकल भी।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract