Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

निर्धनता गयी न मन से

निर्धनता गयी न मन से

1 min
329


वक़्त ने करवट ली

जमाना बदला ऐसा

हमने दूर-दूर तक खोजा बहुत

ग़रीबी कहीं दिखी नहीं !


ग़रीबी की रोना रोती है सिर्फ दुनिया

बात करके देखो अकड़ सबमें है अब


हाँ ग़रीबी आज भी जो है बची

मन की फ़ितरत है सब

दिल का लीचड़पना है।


इस रोग की मात्र एक ही दवा है

खुलकर योग साधे दुनिया

खाये भोर की हवा !


योग से तन मज़बूत बनकर

मन जागृति होगा

तन-मन से किया कार्य

पल में पूरा होगा !


दिल से किया काम

मन को तसल्ली मिलेगी

तुम फिर ग़रीब कहाँ

तुझको दुनिया दिल का राजा कहेगी !


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Drama