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हरीश कंडवाल "मनखी "

Classics

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हरीश कंडवाल "मनखी "

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नदियाँ

नदियाँ

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 नदीयॉं अब सूख गयी हैं,
उनकी छाती पर रसूखदारों की
जेसीबी कूद रही हैं,
वह सिकु़ड़कर नाला बन रही हैं।

 दिन रात चलती मशीनों ने,
 नदियों का सीना चीर दिया है,
रेत पत्थरों के लालच में,
नदियों का चीर हरण हो रहा है।

 सूख रहे हैं नदियों के तट सारे
मुरझा रहे हैं, वन और उपवन
जहॉ थोड़ी धारा बह रही है,
वहॉ अट्टालिकायें खड़ी हो रही हैं।

 मछलियॉ तड़प तड़प कर मर रही हैं,
जलीय प्राणीयों के तोड़ दिये घरबार
पशु पक्षी बिन पानी सब व्याकुल बैठे,
जेसीबी के शोर में कौन सुने उनकी पुकार।

 नदी की धारा पल पल सूख रही हैं
नदी का किनारा बस्तीयॉ बस रही हैं
नहीं समझ रहा कोई प्रकृति का इशारा
आपदा की मौन आहट चेता रही है।

 पर्यटन बढ़ रहा है, सब नाच रहे हैं
राजस्व बढ़ रहा है, सब खुश हो रहे हैं
नदीयॉ चीख रही हैं, इंसान सब मौन है
 आती जब आपदा, तब कहते दोषी कौन है।

 हरीश कण्डवाल मनखी की कलम से.

 


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