नारी शक्ति
नारी शक्ति
भोर की पहली किरण से।
वो काम में लग गई है।।
किसी को सुध नहीं जरा।
की वो सारी रात जगी है।।
बत्ती गुल हो गई आधी रात।
बच्चे कसमसाने लगे गर्मी से।।
वो ले के झलनी बैठ गई।
बच्चों और मेरे सिरहाने से।।
जब अंतराल लंबा हुआ ।
मैंने कहा तुम लेटो मैं झलता हूँ।।
जिद करके फिर लेटा दिया मुझे।
की मैं तो दिन में सो लेती हूँ।।
कुछ खामी आ गयी थी शायद।
की बत्ती अलसुबह ही आ पाई।।
और हमें सुलाने को उसने ।
बिना पलक झपके हवा झलाई।।
दर्द है हाथों में उसके पर।
लब से शिकवा नहीं करती है।।
हे ईश्वर बता तो जरा मुझे।
ये औरतें किस मिट्टी से बनती है।।
दर्द सहकर भी लाती है।
नई जिंदगी इस दुनिया में।।
कोमलांगी होते हुए भी ये।
कितना कुछ सहन करती है।।
घर संवारने के जिम्मा होता है।
पर ताउम्र "अपने घर" को तरसती है।।
शादी से पहले पराया धन और।
शादी के बाद भी दूसरे घर की होती है।।
गला देती है तमाम उम्र पर।
न किसी पे अधिकार रखती है।।
बुरी नजर का साया ना पड़े।
इसलिये बाहर कम निकलती है।।
हो ना जाए शिकार हवस का।
इसलिए कम सजती संवरती है।।
जरा सा दामन खिसका तो।
लोगों को "निमंत्रण" लगता है।।
सबकी नजर से बची रहे ये।
घड़ी-घड़ी लिबास संभालती है।।
इतना सब कुछ सहकर भी।
भला हर किसी का करती है ।।
हे ईश्वर बता तो जरा मुझे।
ये औरतें किस मिट्टी से बनती है।।
