ना समझ
ना समझ
मैं ना समझ हूँ
सच बात कबूल करने को
मगर मजबूर भी हूँ
झूठा वादा करने के लिए।
कुछ समझ नहीं पाता हूँ
ये सब खेल में
मगर मजबूर भी हूँ
ये खेल करने के लिए।
वक़्त ही ऐसा है
किसे इल्जाम दूँ
गम तो इस बात की
मैं क्यों तुझे तड़पा रहूं।
