मज़बूरी
मज़बूरी
हाँ देखा लोगों ने ये मंज़र सड़क के किनारे,
जहाँ पड़े थे ये बुजुर्ग अपनी साँसे गँवा के,
जो रोजी-रोटी की तलाश में निकले पर लाश बन गये
बस यही तो ज़िन्दगी हैं दरमियाँ जीवन और मृत्यु के।।
बीवी बच्चों के पेट भरने रोज सड़कों पर निकल पड़ते,
रोज कुआँ खोदो,पानी निकालो इसी दुपहिये के जरिये,
अपनों के लिए जान दाँव पर लगा,दो जून की रोटी कमाने,
ग़म,संघर्ष,उदराग्नि,आवश्यकता यही पहलू ज़िन्दगी के।।
ज़िन्दगी ही चली गयी उम्र के पायदान नापते-नापते,
भूखें पेट बेरहम,निर्लज्ज हैं उम्र का लिहाज भी ना करते,
ज़िन्दगी गुजर गयी तंगहाली,निर्धनता से झूझते-झूझते।।
हम सभी अपने भाग्य और अपने कर्म लेकर आये,
पैदा हुए कोई झोपड़े में तो कोई चाँदी का चम्मच ले,
ज़िन्दगी का सार जन्म और मृत्यु हैं यही समझ लें!
मानवता पर करारी,गहरी चोट हैं उदाहरण इन जैसे।।
