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Anagha Dongaonkar

Tragedy Classics Inspirational

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Anagha Dongaonkar

Tragedy Classics Inspirational

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शर्मिंदा हूं मैं उन नजरों से 
जो जिस्म से पार रूह तक 
तारतार कर देती है।
शर्मिंदा हूं मैं उन नजरों से 
जो सिर्फ अपने घर की बहू बेटियों के मान सम्मान में झुक जाया करती है।
शर्मिंदा हूं मैं उन खयालो से
 जो अपने मूल्यांकन और मापदंड से मुझे मापते और तोलते हैं।
शर्मिंदा हूं मैं उस सोच से
 जो मुझे सोचने पर मजबूर कर देती हैं
हां शर्मिंदा हूं मैं अपने आप से
 मेरे मुंह में जबान होते हुए भी
 मर्यादा की दहलीज को 
मैं पार न कर सकती हूं 
यह जानके
हां शर्मिंदा हूं मैं अपने आप से 
इस समाज का मैं हिस्सा हूं पर 
औरत के नाम से मुझे 
इस समाज में आज भी नकारा जाता है यह सोच के
Anagha jain 
२८/५/२३©®
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