मुसाफिर
मुसाफिर
न जाने क्यों
अक्सर मुझे
लगने लगा है
फिर से
खामोशी की
तरफ लौट
रही हु
वही अनकही ,
अनसुनी सी
बातें
वह लंबी लंबी रातें
और
आंखों का
सुना पन लिए
जोर-जोर से
धड़कती सासें
जैसे कह रही हो
क्यों तरसती हो
किसी के साथ को
क्यों तरसते
किसी के प्यार को
कब तक
कोई तुम्हारे
साथ चलेगा
रास्ता कठिनाई है
जिंदगी का
क्या हर पल
कोई तुम्हारे
साथ खड़ा होगा
अकेले चलना
नियती है तुम्हारी
राह में मिले
जितने भी साथी
दो पल के
मुसाफिर थे।
हंस लिए
बोल लिए
दुख- सुख
सझा कर लिए
रास्ते के मोड
दो राह चल दिए।
फिर से
अजनबियों की।
तरह।
Anaghajain
©®
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