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Sheel Nigam

Abstract

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Sheel Nigam

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मुट्ठी भर रेत

मुट्ठी भर रेत

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मुट्ठी भर रेत, सूखी सी,

छोड़ गई रीतापन हाथों में,

रह गया शून्य सा मन।


एक आस जगी, जब बन बैठा-

छोटा सा बच्चा, मन,

करने लगा बाल-हठ

वो सब पाने को,

जो खो चुका था जीवन।


जागी एक लगन,

और............

मन के शून्य,

बन गए दो नयन,

बह गया विषाद,

उन नयनों के

झरोखों से,

और.........

बदल गई दिशा दृष्टि राहों की।


इस बार..............

वो रेत सूखी न थी,

उसमें थी नमी अश्रुओं की

और कुछ खारापन भी,

जो ना रिस पाया, न बह पाया,

मेरी इस बंद मुट्ठी के भीतर से,

चार उंगलियों और एक अँगूठे के

बंद आगोश में,

बसी है वो रेत लिए हुए,

आज भी अपने अन्दर,

एक नमी-प्यार की, मनुहार की।


आखिर यही अन्तर तो होता है,

गीली और सूखी रेत में,

होता है रीतापन सूखी रेत में

और नम रहती है गीली रेत सदा,

आशाओं से, प्यार से और भावनाओं से।



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