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aazam nayyar

Romance

4  

aazam nayyar

Romance

मुस्कुराती रही

मुस्कुराती रही

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देखकर वो मुझे रोज़ मुस्कुराती रही !

साथ में प्यार के गीत गाती रही 


देखकर जो सूरत मेले में आया था 

ख़्वाब में रात भर मेरे आती रही 


किस तरह से बढ़ेगी बातें प्यार की 

शर्म से वो निगाहें झुकाती रही 


बात की ऐसी नाजुक होठों से उसनें 

जैसे कोई ग़ज़ल वो सुनाती रही


तन्हाई के अंधेरे हुई दूर यूं 

चांदनी बनकर वो झिलमिलाती रही 


प्यार का राग बजता रहा कान में 

चूड़ियाँ ऐसे वो खनखनाती रही 


बन सकती जो नहीं है मेरी हम सफ़र 

शक्ल दिल को वही आज़म भाती रही।


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