STORYMIRROR

राजेश "बनारसी बाबू"

Action Classics Inspirational

4  

राजेश "बनारसी बाबू"

Action Classics Inspirational

मुंशी प्रेमचंद्र जी

मुंशी प्रेमचंद्र जी

1 min
239

वाराणसी का छोटा सा लमही गांव

मुंशी प्रेमचंद्र जी की यादें संजोए बैठा है

साहित्य के कलम का यह जादूगर मानो

आज भी अपनी साहित्य की खुशबू बिखेरे बैठा है

जब भी मुंशी प्रेमचन्द जी नाम है आता

साहित्य का जैसे पूरा संसार उमड़ आता है

कलम के इस महानुभाव का जन्म 

31 जुलाई सन 1880 में हुआ

मानो जैसे लगा हिंदी साहित्य

में यश कीर्ति वैभव का जन्म हुआ।


जब भी मैं मुंशी प्रेम चंद्र जी महानुभाव के 

पैतृक निवास पर पहुंचता हूँ

गांव के प्रवेश द्वार, स्मारक शोध पर से ही

उनके साहित्य की खुशबू से लगता

स्वयं ही उन्हें पास ही महसूस करता हूँ

कभी यहां कालजयी साहित्य बसा करता था

हर घर आंगन वृक्षों पर साहित्य रचनाकार रहा करता था

समय की परिस्थिति का विरोध उनकी कलम

अपनी जुबानी बताती है


सोजे वतन, पूस की रात, गोदान, ईदगाह जैसे रचना

हमें भी भूतकाल की इतिहास भी बताती है

सवा सेर गेहूं रचना और उनके घर रखा बाट

पूरी कहानी जीवंत कर जाता है।

प्रवेश द्वार पर दीवार पर टंगा चिमटा हमें

उनकी ईदगाह की याद दिलाता है।


आज प्रेम चंद को जयंती आई है

फिर से प्रशासन को इस कलम के सिपाही की याद आई है।

आज मुशी प्रेम चंद्र का गांव

5100 दीपों से फिर प्रज्ज्वलित होगा 

आज फिर से उनके स्मारक पे

लोकनाट्य और उनका माल्यर्पण होगा

कल फिर प्रेम चंद्र जी का पूरा गांव

समय की विषम परिस्थिति और संकट में होगा।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Action