STORYMIRROR

Vivek Mishra

Abstract

3  

Vivek Mishra

Abstract

मुहब्बत छोड़ दी हमने

मुहब्बत छोड़ दी हमने

1 min
383

मुहब्बत छोड़ दी हमने अब दूसरा काम धंधा है

 कौन रोज़ धोखा खाये,क्यूँ सुने की बेगैरत बंदा है।


तुम हर गुज़रते दिन में तुम से दूर होना चाहता था।

हो गया हो दूर तो अब दिल क्यूँ खुद पर शर्मिंदा है।


एक तेरे साथ पाने को हमने हर साथ छोडा है

मगर तुमने जो छोड़ा वही तो अपना घरोंदा हैं


तुम गुजर रही थी वही से जहाँ वादा था कि मैं मिलूंगा तुम्हे

ख़ुदाया भीड़ की आड़ में मत पूँछो कि मर गया वो या ज़िंदा है।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract