मत खोद,मत खोद
मत खोद,मत खोद
खोदना है तो अपने
अंतः को खोदो ।
जमीनों को खोदने
से क्या मिलेगा ?
जमीनों में खुदे
इतिहास से क्या सीखा ?
सदियों से दानव और मानव
का युद्ध होता आ रहा ।
जीतता सदा मानव था ,
पर अब दानव जीत रहा ।
मानव नहीं समझ रहा
अपनी राहें भटक गया ।
अपने अहम को पराजित
न कर पा रहा
पथभ्रष्ट हो रहा ।
कंकालों के साथ खेल रहा ।
खंडरों में भटक रहा
गड़े मुर्दे उठा रहा
छानबीन कर रहा ।
पर आज नहीं सँवारा
भूत-भविष्य में फंसा
पिंजर-सा हुए जा रहा ।
कलयुग का प्राणी कल-पुर्जों
का आविष्कार कर रहा ।
पर
अपने को अभी तक
अविष्कृत नहीं कर पाया ।
लोभ, मोह, काम में फंसा
बस नए महाभारत का
आगाज़ कर रहा ।
राम-रहीम, कृष्ण-करीम का
अपवाद यही रह जाएगा ।
केवल तेरा कर्म ही
तेरे क्षितिज तक ले जाएगा ।
वही तुझ में और तेरे अमन में
सुख-शांति लाएगा ।
आज का कर्म ही
कल स्वर्ग बसाएगा ।
छोड़ रक्त-संहार
खुद भी जी और
औरों को भी जीने दे ।
प्रेम सुधा गंगा में बहा
उत्तर से दक्षिण तक
पूर्व से पश्चिम बहने दे।
यह प्रेम सुधा बहने दे ।
कल
जब तू इतिहास बनेगा
तो प्रेम ही बरसेगा ।
धरा नव-नूतन कली-सी
खील जाएगी और
यह चमन महक जाएगा ।
मानव तेरा कर्म ही
तुझे जिताएगा ।
गड़े मुर्दे मत खोद ,
मत खोद, मत खोद ।
