मरुभूमि से उर्वर भूमि में रूपातंतरण की यात्रा
मरुभूमि से उर्वर भूमि में रूपातंतरण की यात्रा
मेरी ख़ामोशी का शोर न जाने कैसे पहुँच जाता तुम तक,
मेरी मुस्कुराहट के पीछे छुपे दर्द का एहसास तुम्हारी आत्मा को छू जाता,
जीवन के मरूस्थल पर हल्का सा स्पर्श तुम्हारा ओस की बूँद बन,
कर गया प्रदान नवजीवन,
तपती रेत पर ठंडी हवा का झोंका ज्यों दे जाये नई आस,
किया पदार्पण तुमने भी धीमे-धीमें जीवन में मेरे ऐसे ही कुछ एहसास के साथ,
बूँदें ओस की लगी होने परिवर्तित वर्षा की हल्की-हल्की फुहार में,
लगा नाचने मन मयूर ऐसे ज्यों नाचे मयूर रिझाने मयूरी को,
तुम्हारे आलिंगन से लगा होने परिवर्तित मररूस्थल भी उपजाऊ भूमि में,
खिले सुन्दर से दो पुष्प इस भूमी पर, महक उठी नन्ही सी बगिया मेरी।
हूँ साक्षी तुम संग मरुभूमि से उर्वर भूमि में रूपांतरण की यात्रा की,
फिर भी हूँ आश्चर्यचकित देख स्वयं मनोहर वाटिका अपनी,
सींची है तुमने जिसे अपने प्रेम और विश्वास के जल से।
पर्वत की भाँति खड़े रहे तुम पकड़ हाथ मेरा आया तुफ़ान जब भी जीवन में,
घुमावदार तंग गलियाें में बन पथ प्रदर्शक भटकने न दिया कभी राह से,
सहे चोट अपने सीने पर तुमने, जिसकी आहट भी न पहुँचने दी मुझ तक,
बन उर्वरक मरुस्थल को किया परिवर्तित तुमने हरी भरी बगिया में,
ख़ामोशी आज की मेरी करती है बयॉं दास्ताँ असीमित प्यार की तुम्हारे,
बना लिये दर्द मेरे तुमने सभी अपने, सिखा दिया जीना तुमने खुल कर मुस्कुराहट के संग।।

