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Mansi Makkad

Romance


5.0  

Mansi Makkad

Romance


इश्क़ निभाया है

इश्क़ निभाया है

1 min 179 1 min 179

सोचती हूँ तो याद आती है तेरी बातें

तेरे बारे में न सोचूं तो तन्हा हो जाऊँ।


खालिस होकर मैने इश्क़ निभाया है 

फिर कैसे पलीद सी गंगा हो जाऊँ।


ज़िन्दगी तेरे साथ निभाने की तलब है ,

फिर कैसे हार मान के फ़नाह हो जाऊँ।


क्यों तग़ाफ़ुल करते हो मुझे तुम,

फितूर-ए-इश्क़ भुलाकर, कैसे जुदा हो जाऊँ।


शिद्दत से चाहा है, तुझे हमनवा,

फिर कैसे सब दफ़ना के, बेवफा हो जाऊँ।


सुना है इनायत में बड़ी ताकत होती है ,

फिर कैसे अल्लाह के दर से दफ़ा हो जाऊँ।


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