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Akanksha Gupta

Abstract


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Akanksha Gupta

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मोहब्बत पैरहन नहीं

मोहब्बत पैरहन नहीं

1 min 232 1 min 232

मोहब्बत पैरहन नहीं मेरी रूह का वो मक़ाम है

तेरे नाम से ही मेरे दिल की धड़कनों का क़याम है


मिलने को बहुत तरसते है ख्याल तेरे दीद का

आज भी जो खत लिखें तुझे हमने बेनाम है


मोड़ कर कुछ पन्नों पर लिखी थी जो दास्ताँ

आज भी उस एक गली का नाम गुमनाम है


ख़्वाहिशें हज़ार थीं ख़्वाबों के इस महल मे

अफसाना बन कर आज दुनिया में बदनाम है


आज तलक़ नहीं मिलता सवाल इस जवाब का

मोहब्बत के लफ्ज़ो में लिखी एक अधूरी शाम है।


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